पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जनपद बिजनौर की नगीना तहसील अपने शिल्पकारों के उच्चतम कला कौशल के लिए अन्तर्राज्यीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचानी जाती है। नगीना के पुश्तैनी लकड़ी पर किए जाने वाले कार्विंग का सिलसिला मुगल काल से जुड़ा हुआ है। एक हजार वर्ष पुरानी यह कला राजघरानों से चलकर ज़मींदारों के ज़रिए ब्रिटिश शासन तक फलती-फूलती रही।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस कला पर खतरे के बादल मंडराने लगे। क्योंकि स्थानीय कलाकारों द्वारा तैयार की गई कलाकृतियाँ उच्चकोटि की होने के कारण बहुमूल्य होती थीं, अतः उनके खरीदार नगण्य होते चले गए। वर्ष 1968 आते-आते नगीना में इस कार्य को करने वाले परिवारों की संख्या मात्र पाँच रह गई। अन्य शिल्पकारों ने अपना पेशा बदल लिया था या महानगरों की ओर पलायन कर गए थे।
वर्ष 1968 नगीना के काष्ठ शिल्प के लिए एक स्वर्णिम वर्ष के रूप में याद किया जाता है, क्योंकि इसी वर्ष भारत सरकार ने नगीना के मास्टर क्राफ्ट्समैन श्री अब्दुल रशीद को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया। कार्यालय विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) ने विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अति लघु उद्योग को अपनी हस्तशिल्प नीति के अनुरूप न केवल जीवनदान दिया, बल्कि योजनाओं के माध्यम से इसकी मृतप्रायः कोशिकाओं में रक्त संचार का कार्य किया। स्व० अब्दुल रशीद साहब के माध्यम से एक ट्रेनिंग स्कीम नगीना में लागू की गई, जहाँ श्री रशीद के अथक प्रयत्नों से स्थानीय बेरोज़गार युवकों ने इस शिल्प से नाता जोड़ना शुरू किया। वहीं श्री मौलवी दाऊद ने इन अनपढ़ नौजवानों के लिए रात्रि स्कूल की स्थापना कर प्रशिक्षित युवाओं को प्रौढ़ शिक्षा के माध्यम से शिक्षित करना शुरू किया।
एक ओर कार्यालय विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) ने ट्रेनिंग स्कीम के अंतर्गत देश के महानगरों में प्रदर्शनियों का आयोजन कर इनकी कलाकृतियों को विक्रय हेतु युवाओं को रोज़गार से जोड़ा। वहीं इनके उत्पादों के विक्रय हेतु अखिल भारतीय स्तर पर बाज़ार उपलब्ध कराए। इन प्रदर्शनियों के माध्यम से देश के महानगरों में रहने वाले निर्यातकों का परिचय इन छोटे-छोटे कारीगरों से हुआ। प्रदर्शनियों का लाभ सीधे कारीगरों को मिला। एक ओर जहाँ वे अपनी कृतियों का उच्चतम मूल्य प्राप्त कर अति उत्साहित हुए, वहीं उच्चवर्गीय व्यक्तियों, शोरूम मालिकों व निर्यातकों से ऑर्डर मिले। इस प्रकार रोज़गार के अवसर सुगम होते गए तथा स्थानीय कलाकारों की संख्या में प्रतिवर्ष वृद्धि होती चली गई।
अतः वर्ष 1968 में जहाँ यह काष्ठ कला मात्र पाँच परिवारों तक सीमित थी, वह बढ़कर आज स्थानीय कारीगरों की संख्या लगभग 10 हजार हो गई है। कल तक इस कला से एक विशेष वर्ग के लोग जुड़े थे, आज प्रत्येक वर्ग, समुदाय एवं धर्म के लोग इस कला के माध्यम से अपना जीवन-स्तर ऊपर उठाने में लगे हैं। प्रत्येक गली-कूचे तथा मोहल्ले तक फैले इस उद्योग का श्रेय मुख्य रूप से कार्यालय विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) को जाता है, साथ ही उन स्थानीय कलाकारों को भी जिन्होंने अपने अथक परिश्रम से इस कला को अन्तर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप विकसित कर अपने उत्पादों की माँग बनाए रखी।
नगीना की एकमात्र गैर-सरकारी संस्था नगीना क्राफ्ट डेवलपमेंट सोसाइटी ने भी स्थानीय समस्याओं से उच्च अधिकारियों को अवगत कराया। संस्था ने एक ओर कार्यालय विकास आयुक्त की योजनाओं का लाभ स्थानीय शिल्पकारों तक पहुँचाया, वहीं नगीना काष्ठ कला को वर्तमान उच्चतम शिखर तक ले जाने में अविश्वसनीय योगदान दिया। नगीना क्राफ्ट डेवलप्मेंट सोसायटी ने विकास आयुक्त के वित्तीय सहयोग से कैटलॉग प्रकाशित कराया।
कल तक स्थानीय शिल्पकार अपने माल को निर्यातकों के पास ले जाने में कठिनाइयाँ सहन करते थे। एक छोटा शिल्पकार अपने उत्पादों व नमूनों को गत्ते के डिब्बे में भरकर कंधों पर लिए जाता था—चाहे चिलचिलाती धूप हो या सर्दियों की बर्फीली हवाएँ। परन्तु कैटलॉग प्रकाशित होने के बाद वह अपना सामान एक ब्रीफकेस में ले जा सकता है। कल इस शिल्पनगर में आत्मविश्वास की कमी थी, जिसके कारण उसका शोषण होता था। आज वह आत्मविश्वास से भरा है और अपने माल तथा परिश्रम को उच्चतम मूल्य दिलाने में समर्थ है, जिससे उसका जीवन-स्तर दिन-प्रतिदिन ऊपर उठ रहा है।
कल वह इसलिए भी अनपढ़ रह गया था कि परिवार की निर्धनता के कारण... आज नगीना क्राफ्ट डेवलप्मेंट सोसायटी के नेतृत्व में मार्गदर्शन पाकर वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में सफल हो गया है। कल आयकर विभाग तथा विक्रय कर कार्यालयों के नाम शिल्पकारों के लिए भयानक दैत्य से कम नहीं थे। आज ये शिल्पकार इन कार्यालयों से निकटता बनाए हुए हैं।
नगीना काष्ठ कला का अभी विकास कई मंज़िलें पार करना बाकी है। इस कला को विकसित करने की आवश्यकता केवल इसलिए नहीं है कि यह स्थानीय बेरोज़गारी के निराकरण का एकमात्र साधन है, बल्कि इसलिए भी कि यहाँ के उत्पादों का विदेशों में निर्यात होता है, जिससे लगभग 35 करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा प्राप्त होता है। यहाँ के शिल्पकार लकड़ी के छोटे-से-छोटे टुकड़े को अपने परिश्रम और लगन से स्वर्ण में बदलने का हुनर रखते हैं।
आवश्यकता है कि इस क्षेत्र पर विशेष ध्यान देकर कम पूँजी में अधिक लाभ देने वाले इस उद्योग की गति में बाधक तत्वों का निराकरण किया जाए। विशेषकर कच्चे माल की आपूर्ति, विद्युत आपूर्ति, स्वास्थ्य शिविर, प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम तथा काष्ठ शिल्प ग्राम की आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ। इन समस्याओं के निराकरण से रोज़गार और उत्पादन बढ़ेगा तथा सरकार को भी भारी मात्रा में राजस्व प्राप्त होगा।
नगीना वह नग है जो आभूषणों को कीमती और सुंदर बनाता है। अपने नाम के अनुरूप नगीना तहसील भारत वर्ष को सुंदर एवं बहुमूल्य बनाने में अपना योगदान दे रही है।
अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में यहाँ की काष्ठ कला के नमूने अपनी अलग पहचान रखते हैं। नगीना के नगों में राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता श्री अब्दुल रशीद, श्री अब्दुल रहमान, श्री अब्दुल सलाम, श्री शब्बीर हुसैन, श्री बशीर अहमद, श्री अब्दुल्लाह के नाम सर्वोपरि रहे हैं। वहीं वर्तमान में काष्ठ कला उद्यमी बशीर अहमद, जुल्फिकार आलम, खुर्शीद कुरैशी, अंजार आलम, रवि विश्नोई, फारूक मुल्तानी, सलीम अहमद, इश्तियाक अहमद, बाबू भाई, ज़फर अहमद, शमीम अख्तर, मतलूब अहमद, इसरार कुरैशी, अब्दुल रऊफ, फखरुद्दीन आदि इस उद्योग को निरंतर आगे बढ़ाने में जुटे हुए हैं।
साभार : इरशाद अली मुल्तानी : अध्यक्ष नगीना क्राफ्ट डेवलप्मेंट सोसायटी
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