कल्पना कीजिए, बिजनौर जिले के छोटे से कस्बे स्योहारा (सोहरा) में एक समृद्ध जमींदार परिवार में जन्मा बालक, जो बचपन से ही इस्लामी शिक्षा की रोशनी में पला-बढ़ा। वह न सिर्फ एक बड़े आलिम-ए-दीन बने, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ तूफान बनकर खड़े हो गए। आठ साल जेल की सलाखों के पीछे बिताए, लेकिन कभी झुके नहीं। देश की आजादी के बाद संविधान सभा के सदस्य, लोकसभा सांसद और मुस्लिम समुदाय के मार्गदर्शक बने। यही हैं मौलाना हिफ्जुर रहमान सोहरवी (1900-1962), जिन्हें "मुजाहिद-ए-मिल्लत" का खिताब मिला।
जन्म और प्रारंभिक जीवन: बिजनौर की मिट्टी से जुड़ी जड़ें
मौलाना हिफ्जुर रहमान सोहरवी का जन्म 1900 (1318 हिजरी) में उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के स्योहारा कस्बे में एक प्रतिष्ठित जमींदार परिवार में हुआ। उनके पिता हाजी शम्सुद्दीन साहब भोपाल और बाद में बीकानेर रियासत में असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे।
घरेलू शिक्षा के बाद उन्होंने मदरसा फैज-ए-आम स्योहारा, मदरसा शाही मुरादाबाद में पढ़ाई की। 1922 में दारुल उलूम देवबंद पहुंचे, जहां उन्होंने हदीस की उच्च शिक्षा पूरी की। उनके उस्तादों में अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी जैसे महान विद्वान शामिल थे। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने शिक्षण कार्य शुरू किया और लेखन की दुनिया में कदम रखा।
बिजनौर जिले की इस धरती ने उन्हें वह जज्बा दिया जो पूरे देश की आजादी की लड़ाई में दिखा। स्योहारा आज भी उनके नाम से जुड़ा हुआ है और स्थानीय लोग उन्हें गर्व से याद करते हैं।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: 25 साल की अथक लड़ाई
मौलाना साहब मात्र 18-19 वर्ष की उम्र में 1919 के खिलाफत आंदोलन से जुड़ गए। रौलट एक्ट के विरोध में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की। 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में उन्होंने पूरा जोर लगाया।
1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी मार्च के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी वे पूरी ताकत से शामिल हुए। कुल मिलाकर उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ करीब 25 साल (1922-1947) संघर्ष किया और आठ साल जेल में बिताए। जेल में रहते हुए भी उन्होंने हार नहीं मानी—बल्कि वहां "बलाग-ए-मुबीन" जैसी सीरत-ए-नबवी पर महत्वपूर्ण किताब लिखी।
वे जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रभावशाली नेता थे। 1942 में इसके चौथे महासचिव बने और लंबे समय तक इस पद पर रहे। 1930 के अमरोहा अधिवेशन में उन्होंने कांग्रेस के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी का प्रस्ताव पास करवाया। 1932 के आंदोलन में "इदारा हरबिया" में स्वयंसेवकों का नेतृत्व किया। देश भर में घूम-घूमकर लोगों को जागृत किया।
मुस्लिम लीग और विभाजन का कड़ा विरोध: मौलाना साहब पाकिस्तान की मांग के घोर विरोधी थे। उन्होंने "तहरीक-ए-पाकिस्तान पर एक नजर" जैसी रचनाओं में विभाजन की सच्चाई उजागर की। वे दृढ़ता से मानते थे कि हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना भारत की आजादी अधूरी है। विभाजन के बाद दंगों के समय महात्मा गांधी के उपवास के दौरान उन्होंने स्थिति सुधारने का आश्वासन दिया, जिससे गांधी जी ने उपवास तोड़ा।
आजादी के बाद: राष्ट्र निर्माण में भूमिका
स्वतंत्र भारत में मौलाना साहब ने कांग्रेस के टिकट पर राजनीति जारी रखी। 1949 में हापुड़-खुर्जा से यूपी विधानसभा के निर्विरोध सदस्य चुने गए। 1950 में संविधान सभा के सदस्य मनोनीत हुए, जहां उन्होंने मुस्लिम समुदाय के अधिकारों और भारत को सेकुलर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
1952, 1957 और 1962 में अमरोहा लोकसभा सीट से तीन बार सांसद चुने गए। 1962 के चुनाव में वे अमेरिका में इलाज के लिए थे, फिर भी अमरोहा की जनता ने उन्हें गैरमौजूदगी में भारी मतों से जिताया—यह उनके प्रति जनता के प्यार और विश्वास का प्रमाण था। संसद में वे बेबाकी से बोलते थे और मुस्लिम समुदाय के हितों की रक्षा करते थे।
साहित्यिक और शैक्षिक योगदान
मौलाना साहब सिर्फ राजनीतिज्ञ नहीं, बल्कि प्रखर लेखक और विद्वान भी थे। 1938 में उन्होंने दिल्ली में नदवतुल मुसन्निफीन की सह-स्थापना की, जो इस्लामी साहित्य और शोध का प्रमुख केंद्र बना।
अंतिम यात्रा और विरासत
लगातार संघर्ष और व्यस्तता के कारण वे कैंसर से ग्रस्त हो गए। इलाज के लिए अमेरिका गए, लेकिन 2 अगस्त 1962 को मात्र 62 वर्ष की आयु में दिल्ली में उनका निधन हो गया। उनकी अंतिम नमाज-ए-जनाजा दारुल उलूम देवबंद के मुहतमिम कारी मुहम्मद तैयब ने पढ़ाई। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू समेत हजारों लोगों ने श्रद्धांजलि दी। करीब दो लाख लोग जनाजे में शामिल हुए। उन्हें दिल्ली के मुंहदियाँ (मेहंदियान) में शाह वलीउल्लाह देहलवी के पास दफनाया गया।
बिजनौर और नगीना के लिए प्रेरणा
बिजनौर जिले के स्योहारा से निकले इस महान सपूत ने पूरे देश को दिखाया कि शिक्षा, साहस और एकता से कोई भी ताकत नहीं हरा सकती। नगीना.नेट जैसे स्थानीय पोर्टल पर उनकी कहानी याद दिलाती है कि हमारी जड़ें कितनी गहरी और गौरवशाली हैं। आज के युवाओं को उनकी जिंदगी सिखाती है—देशभक्ति, हिंदू-मुस्लिम एकता और सच्ची आजादी का मतलब।
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